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वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

व्रत विधि

'वैभव लक्ष्मी व्रत' उद्यापन विधि:
सात, ग्यारह या इक्कीस, जितने भी शुक्रवारों की मन्नत माँगी हो, उतने शुक्रवार ‍तक यह व्रत पूरी श्रद्धा तथा भावना के साथ करना चाहिए| आखिरी शुक्रवार को इसका शास्त्रीय विधि के अनुसार उद्यापन करना चाहिए|
आखिरी शुक्रवार को प्रसाद के लिए खी‍र बनानी चाहिए| जिस प्रकार हर शुक्रवार को हम पूजन करते हैं, वैसे ही करना चाहिए| पूजन के बाद माँ के सामने एक श्रीफल फोड़ें फिर कम से कम सात‍ कुंआरी कन्याओं या सौभाग्यशाली स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर मां वैभवलक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक की एक-एक प्रति उपहार में देनी चाहिए और सबको खीर का प्रसाद देना चाहिए| इसके बाद माँ लक्ष्मीजी को श्रद्धा सहित प्रणाम करना चाहिए|
फिर माताजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करें- 'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है| हे माँ! हमारी (जो मनोकामना हो वह बोले) मनोकामना पूर्ण करें| हमारी हर विपत्ति दूर करो| हमारा सबका कल्याण करो| जिसे संतान न हो, उसे संतान देना| सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना| कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना| जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना| सभी को सुखी करना| हे माँ! आपकी महिमा अपार है|' आपकी जय हो! ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छवि को प्रणाम करें|

व्रत कथा

किसी शहर में अनेक लोग रहते थे| सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे| किसी को किसी की परवाह नहीं थी| भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए| शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं| शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे| इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे| ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी| शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी| उनका पति भी विवेकी और सुशील था| शीला और...

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