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पूर्णिमा व्रत कथा

पूर्णिमा व्रत कथा

व्रत विधि

कार्तिक की पूर्णिमा से विवाह होता है I जिन लड़कियों का विवाह होने वाला होता है वह तेरह व्रत करती हैं । एक पाटा पर जल का लोटा, एक गिलास में गेहूँ, रोली, चावल, दक्षिणा रखो । बाना के लिए एक करुवा में गेहूँ और ढक्कन में चीनी और रुपिया रख कर, पाटा पर रखो । लोटा में सथिया बनाकर तेरह टिक्की दो । तेरह दाना गेहूँ का हाथ में लेकर कहानी सुनो । करुवा पर बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो और गेहूँ ब्राह्मणी को दे दो । तेरह दाना गेहूँ और उसी लोटे के जल से रात को चाँद को अरग देकर खाना खा लो । अगर किसी से तेरह व्रत नहीं हो सके, तो पहली साल पूर्णिमा को व्रत करके दूसरी साल पूर्णिमा को तेरह ब्राह्मणियों से व्रत करवा कर उजमन करो । व्रत तीन प्रकार से किया जाता है, करुवा पुन्यू, चुनड़ पुन्यू और चूड़ा पुन्यू । करुवा पुन्यू तो लिखी है । चुनड़ पुन्यू और चुड़ा पुन्यू में सब तो ऐसे ही करते हैं, सिर्फ बाना चीनी और रुपिया पर निकालते हैं ।

पूर्णिमा का उजमन
पूर्णिमा का उजमन तेरह पूर्णिमा का व्रत करने के बाद कार्तिक की पूर्णिमा को करते हैं । अगर करुवा पुन्यू का उजमन कर रहे हो तो, करुवा के बदले चांदी की घंटी (लोटा) में मेवा भर कर, रुपिया रख कर, बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो । अगर चुनड़ पुन्यू का उजमन कर रहे हो तो एक चुनड़ी, चीनी, रुपिया पर बाना निकालकर सासुजी को पैर छूकर दे दो और तेरह चुनड़ी ब्राह्मनियाँ को दो । अगर चुड़ा पुन्यू का उजमन कर रहे हो तो, चीनी रुपिया पर बाना निकाल कर सासुजी को पैर छूकर दे दो और तेरह चुड़ा ब्राह्मनियाँ को दो I अगर मन हो तो ब्राह्मनियों को खाना भी खिला दो I

व्रत कथा

एक नगर में एक सेठ (साहूकार) को दो बेटियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है। उसने पंडितों की सलाह...

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